काजोल-कृति सेनन की 'दो पत्तियां': कमजोर कहानी और निराशाजनक प्रदर्शन

काजोल-कृति सेनन की 'दो पत्तियां': कमजोर कहानी और निराशाजनक प्रदर्शन

काजोल और कृति सेनन की 'दो पत्तियां': समीक्षा

फिल्म 'दो पत्तियां' के रिलीज होने के बाद से इसकी समीक्षा का दौर चल रहा है और अधिकांश दर्शक इसे सामान्य दर्जे की फिल्म मानते हैं। इस फिल्म का इंतजार काफी समय से था, क्योंकि इसमें काजोल और कृति सेनन जैसी अदाकाराएं मुख्य भूमिकाओं में दिखाई दे रही हैं। हालांकि, फिल्म की कहानी और प्रदर्शन ने अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका।

कहानी का कमजोर आधार

फिल्म की कहानी कोशिश करती है कि वह दर्शकों को जोड़ सके, परंतु यह पुराने और परिचित कथानक पर आधारित होती प्रतीत होती है। कहानी में नवीनता और रोमांच की कमी नजर आती है जो दर्शकों को बांधे रख सके। फिल्म में रहस्य, रोमांच और अपराध की छवि उभारी गई है, परंतु यह छवि निराशाजनक है। इसकी कहानी हम पहले कई फिल्मों में देख चुके हैं और यहां ऐसा कुछ नया प्रस्तुत नहीं किया गया है जो दर्शकों को चौंका सके।

काजोल और कृति सेनन का प्रदर्शन

अभिनय की बात करें तो काजोल का प्रदर्शन आशा के अनुरूप नहीं है। वे एक पुलिस अधिकारी विद्या ज्योति की भूमिका निभाती हैं, लेकिन उनका अभिनय काफी कृत्रिम लग रहा है और संवाद कहीं न कहीं अनुमानित सुनाई देते हैं। दूसरी ओर, कृति सेनन ने दोहरी भूमिकाएं निभाई हैं मुख्यतः सौम्या सूद और शेली सूद के रूप में, लेकिन यह पात्र भी इनके अभिनय में भिन्नता नहीं ला सके हैं। इसे देखते हुए, दोनों किरदारों में अंतर करना मुश्किल हो जाता है।

निर्देशन का अभाव

शशांक चतुर्वेदी का निर्देशन भी विशेष रूप से नहीं जंचता। फिल्म की शुरुआत बेहद धीमे कदमों पर होती है, और बीच के कुछ दृश्य निर्मित करने की आवश्यकता ही नहीं थी। ये दृश्य फिल्म की गति को और कम कर देते हैं और दर्शकों का ध्यान भटकाने का कार्य करते हैं। ऐसा लगता है मानो कुछ दृश्य को जोर-जबरदस्ती से शामिल कर दिया गया हो।

संगीत और सामान्य अनुभव

संगीत के परिप्रेक्ष्य में, अनुराग सैकिया के संगीत ने भी दर्शकों को निराश किया है। ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि फिल्म के संगीत प्रभावी न लगें, परंतु 'दो पत्तियां' के साथ यही हुआ है। संगीत में वह बात नहीं है जो इसे यादगार बना सके और साथ ही यह सीन के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता।

कुल मिलाकर, 'दो पत्तियां' को एक बार देखना संभव है समय बीताने के लिए, लेकिन यह फिल्मों की श्रेणी में कोई विशेष छाप नहीं छोड़ पाती। यह सोचिए कि अमूल्य समय को आप कुछ बेहतर सामग्री के लिए बचा सकते हैं। फिल्म को 1.5 में से 5 स्टार दिए जा सकते हैं, और यह केवल इसलिए क्योंकि काजोल और कृति सेनन जैसी अभिनेत्रियों का स्क्रीन प्रजेंस भी लोगों को कोई थोड़ी देर के लिए बांध सकता है।

8 Comments

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    Aakash Parekh

    अक्तूबर 26, 2024 AT 08:49
    बस एक बार देख ली, फिर नहीं देखी। समय बर्बाद हुआ। 😴
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    Sagar Bhagwat

    अक्तूबर 27, 2024 AT 00:10
    अरे यार, ये फिल्म तो बहुत अच्छी थी! लोग बस इसलिए खराब बता रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि काजोल को हमेशा ऑस्कर वाली भूमिकाएं मिलनी चाहिए। ये तो एक शांत, गहरी फिल्म है।
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    Jitender Rautela

    अक्तूबर 28, 2024 AT 19:23
    अरे भाई, ये फिल्म देखकर मैंने सोचा कि निर्देशक ने बस दो एक्ट्रेस को स्क्रीन पर बैठा दिया और कैमरा चला दिया। कहानी? कौन जानता है क्या हुआ? बस थोड़ा रहस्य, थोड़ा ड्रामा, और बाकी सब बोरिंग। कृति ने दो भूमिकाएं निभाईं? बस दोनों में बाल लंबे और छोटे कर दिए, और बस! अभिनय का क्या? अभिनय तो वो होता है जब आप एक ही आदमी के दो पहलू दिखाएं। यहां तो दो अलग लोग लग रहे थे जो एक ही फिल्म में आ गए।
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    abhishek sharma

    अक्तूबर 30, 2024 AT 12:42
    मैंने ये फिल्म देखी थी और बाद में एक दोस्त ने कहा कि ये फिल्म बहुत गहरी है। मैंने सोचा, अरे यार, ये तो एक फिल्म है न, न कोई सामाजिक अध्ययन। लेकिन जब मैंने फिर से देखा, तो एहसास हुआ कि असली समस्या ये है कि फिल्म खुद नहीं जानती कि वो क्या बनना चाहती है। क्या ये थ्रिलर है? ड्रामा? फैमिली स्टोरी? नहीं। ये एक अस्वीकृत टेलीविजन सीरीज का असफल पायलट है जिसे किसी ने बजट दे दिया और फिल्म बना दिया। काजोल के अभिनय में तो वो बोझ था जो उन्हें लगता है कि उन्हें भारत की सबसे बड़ी अभिनेत्री होना है। और कृति? वो तो बस अपने बालों के बदलाव से अपने पात्रों को अलग करने की कोशिश कर रही थीं। निर्देशन? शशांक चतुर्वेदी ने तो ये समझा कि जितना धीमा चलेगा, उतना गहरा लगेगा। बस, एक धीमी गाड़ी जो बिना गंतव्य के घूम रही है।
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    Surender Sharma

    अक्तूबर 31, 2024 AT 20:03
    kajol ki acting toh bhi kuchh nahi hai... aur kriti ne bhi kuchh nahi kiya... music? bhai koi bhi gaana yaad nahi raha... 1.5 stars? main toh 1 de deta... aur bhi time waste kiya than this movie
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    Divya Tiwari

    नवंबर 2, 2024 AT 16:54
    इस फिल्म को खराब बताने वाले लोग अपने देश के लिए शर्मिंदा होने चाहिए। हमारी अभिनेत्रियां दुनिया की सबसे बड़ी हैं, और तुम इस फिल्म को निराशाजनक कह रहे हो? ये फिल्म हमारी संस्कृति का प्रतीक है - जहां दो महिलाएं अपने अंदर के रहस्यों को सामने लाती हैं। तुम्हारा दिमाग बस बॉलीवुड के धमाके और नृत्य के लिए तैयार है, लेकिन गहराई को समझने की ताकत नहीं। ये फिल्म तुम्हारे लिए नहीं है।
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    shubham rai

    नवंबर 3, 2024 AT 23:05
    mood off ho gaya after watching this... 😔
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    Jitender Rautela

    नवंबर 4, 2024 AT 06:03
    अरे यार, तुम लोग इतना ज्यादा गहराई ढूंढ रहे हो कि फिल्म का बेसिक बात ही भूल गए। ये फिल्म तो बस एक बात बताना चाहती थी - कि कभी-कभी दो लोग एक ही शख्स के दो अलग अंश होते हैं। नहीं, तुमने ये नहीं समझा। तुमने सोचा कि दोनों अलग लोग हैं। लेकिन जब काजोल अंत में बोलती है कि 'मैंने खुद को खो दिया', तो ये बात साफ हो जाती है। ये फिल्म एक आत्म-खोज की कहानी है। तुम लोगों को तो बस एक्शन चाहिए।

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